मैं बीमार नहीं हूं
मुझे मेहनत का फल नहीं मिलता!!
किस्मत खराब हैं!!
समय साथ नहीं है मेरे!!
थोड़ा और होता तो बेहतर होता!!
बस इतना मिल जाए और कुछ नहीं चाहिए!!!
और ना जाने क्या क्या विचार प्रतिदिन आते है, कदापि अभी भी आरहे होंगे | सामान्यत: हर व्यक्ति के मन में लगभग ५००००० बार यह विचार आते है, कोई गिनती नहीं है कोई यंत्र नहीं है मापने का प्रति क्षण हमारे में चलता रहता है और तो और स्वप्न भी आते है नींद में भी दिमाग यही सब सोच रहा होता है।
मन की अशांति का शायद यही कारण हो सकता है, नींद नहीं आना , तनाव में रहना, बी पी में ऊपर नीचे होना आदि और फिर कोई ना कोई बीमारी हो जाना आजकल के समय के अनुसार।
अच्छी बात यह है कि बाज़ार और इंटरनेट में इनसे मुक्ति पाने के हजारों उपाय उपलब्ध है
योग, व्यायाम, दवाई, गूगल ज्ञान, ब्लॉग, सुझाव और ना जाने क्या क्या।
एक और नया व्यापार!!!!!!!!
आपके उन सामान्य मानवीय विचारों को एक बहुत बड़ी समस्या बता कर आपको मानसिक रूप से एक रोगी घोषित किया जाता है और फिर शुरू होता है उसका उपचार। यदि मेरे पेट में दर्द नहीं है और यह सोच बना दी जाती है कि दर्द है और दवाई लेने से सही होगा तो उपचार दर्द का हो रहा है या बनाई हुई सोच का? थोड़ा विचार कीजिए!!
एक कहानी
एक डॉक्ट साहब थे बड़े सज्जन सबका उपचार निशुल्क करते और सबका कहना था इनकी दवाई रामबाण है। खुद ही बनाते थे दवाई और देते से निशुल्क सबको, भले आदमी सेवा का भाव और असरदार उपचार।
एक बार दवाई कंपनी ने सरकार से शिकायत की और दवाई की जांच की गई, जांच में वो गुड,हल्दी और काली मिर्च का घोल था।
डॉक्टर साहब से पूंछा गया उनका उत्तर आया की जब में किसी बीमार को बोलता की बुखार है दो दिन आराम करो और कुछ गरम खाओ जो घर में बनता है तो लोग मजाक उड़ाते की कैसा डॉक्टर है को दवाई नहीं देता, इसलिए यह मैंने घर पर बनाया और बीमार को एक शीशी देकर बाकी कुछ और घरेलू उपचार करने को केहता तो मान जाते और दवाई के लिए धन्यवाद देकर बाकी बात मान लेते और सही हो जाते। उनका उपचार तो वैसे ही हुआ जैसे पहले बताया था पर अब शरीर के साथ सोच को भी उपचार मिल गया और बीमार सही हो गए।
समझ तो आपको आ रहा होगा, शायद पहले से पता भी होगा की दवाई एक छलावा थी, एक दवाई है मेरे पास भी आपके लिए
मेरी दवाई अगले ब्लॉग में ......
भैया व्यापार है!!!!!!
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